मैं बिकना चाहता हूं। न न इसे मजाक न समझें। वाकई मैं बिकना चाहता हूं। बिककर बिकने का सुख भोगना चाहता हूं। देखना और महसूस करना चाहता हूं कि आखिर कैसा लगता है बिककर!
वैसे खुद को बेचने का ख्याल मेरे मन में काफी दिनों से है। बस, मेरी संवेदनाओं और लोक-लाज का भय बीच में आ जाता है। वैसे राज की बात बताऊं एक-आध दफा तो बीच चौहराए पर खड़े होकर मैंने खुद को बेचने की कोशिश भी की लेकिन कोई खरीददार ही नहीं मिला। जैसे-तैसे कोई मिला भी उसने मेरे दाम बहुत कम लगाए। हर बार बात यहीं पर आकर ठहर जाती थी कि तुम्हारी औकात क्या है? मतलब कि तुम अपनी औकात में कितने बड़े खिलाड़ी, राजनेता, अभिनेता या अफसर हो। मेरे लेखक होने की बात सुनकर लोग यूं बिदक जाते थे कि मानो मैं बहुत ही तुच्छ प्राणी हूं इस धरती पर। लोगों के अपने प्रति 'बेढंगे विचारों' को सुनकर खुद को कोसता था कि हाय! मैं लेखक क्यों हुआ? क्यों कोई खिलाड़ी या नेता नहीं हो सका? अगर खिलाड़ी या नेता होता तो शायद ऊंचे दामों में बिककर अपने इंसान होने की कीमत कहीं किसी के 'दरबार' में चुका रहा होता। अब जिसे कहना हो वो कहे कि इंसान बिकते नहीं, संघर्ष करते हैं। मगर मैं इसे नहीं मानता। आजकल बिकना सबसे आसान रास्ता है, खुद को संघर्षों से बचाने का।
वैसे भी अब इंसानों के बिकने में कहीं कोई शर्म नहीं। राजनीति से लेकर क्रिकेट तक सब बिक रहे हैं। खूब बिक रहे हैं। ऊंचे-ऊंचे दामों पर बिक रहे हैं। जिसका जितना नाम उतना उसका दाम। बिकने के दाम लाखों से करोड़ों में पहुंच गए हैं। बिकने का धंधा अब गंदा नहीं रहा। समाज में जब धर्म और इमान बिक सकता है, फिर इंसान के बिकने में क्या शर्म! इंसान तो जन्म से लेकर मृत्यु तक कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर बिकता ही रहता है। बिकना इंसान का स्वभाव बन चुका है। इस स्वभाव को सबसे अच्छी तरह पहचाना है, बाजार ने। बाजार हर कीमत पर इंसान को अपने नफे के लिए खरीदने को तैयार बैठा रहता है।
दरअसल, आईपीएल में आप जिन खिलाड़ियों को बिकते हुए देखते व सुनते हैं, वे बाजार के गुलाम होते हैं। बाजार खिलाड़ियों के साथ-साथ उनके खेल, उनकी प्रतिभा को भी खरीद लेता है। हम महंगे खिलाड़ियों के बिकने पर ताली बजाते हैं। प्रसन्न होते हैं। और जो नहीं बिक पाते वे न बाजार में ठहर पाते हैं न खेल में चल पाते। यानी अब यह कायदा-सा बनता जा रहा है कि अगर अच्छा खेलना जानते हो तो अच्छा बिकना भी सीखो।
मुझे यह भी लगता है कि बिकने का काफी कुछ दारोमदार आपकी फैन-फोलोइंग पर भी निर्भर करता है। जहां जिस खेमे में आप जितने पूजे जाएंगे, सम्मान भी उतना ही पाएंगे। राजनीति और खेल में बस यही सबसे जरूरी पैमाना है, आपके कद को मापने का। अगर आपके नाम के साथ 'महान' या 'बड़ा' लगा हुआ है, फिर चिंता की कोई बात नहीं। यह बाजार आपका है। मुंह मांगे दाम आपके हैं।
हां, मैं इस बात को जानता हूं कि मैं अभी उतना 'महान' या 'बड़ा' नहीं हो पाया हूं कि ऊंचे दामों पर बिक सकूं। लेकिन मेरी कोशिशें जारी हैं। क्या हुआ जो लेखक हुआ! मैं आपको लेखक होकर ही ऊंचे दामों पर बिककर दिखाऊंगा। बस थोड़ा धैर्य के साथ इंतजार कीजिए।
Thursday, February 4, 2010
मैं भी बिकना चाहता हूं
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 9:40 PM 5 comments
Labels: व्यंग्य
Monday, February 1, 2010
क्यों नहीं लिखतीं महिलाएं व्यंग्य?
पिछले कई दिनों से ये प्रश्न मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचा रहे हैं कि महिलाएं व्यंग्य क्यों नहीं लिखतीं? व्यंग्य लेखन में पुरुषों का ही दबदबा क्यों बना रहता है? लेखन के जिन खांचों के भीतर रहकर महिलाएं लिखती हैं, उनमें स्त्री-विमर्श तो हर कहीं मौजूद है, परंतु उसमें व्यंग्य कहीं शामिल नहीं होता। अव्वल तो स्त्री-विमर्श की घिसी-पिटी धारणा के ही मैं खिलाफ हूं, फिर भी अगर महिलाएं स्त्री-विमर्श को चलना ही चाहती हैं तो उसे व्यंग्य के माध्यम से क्यों नहीं चलातीं? व्यंग्य को स्त्री-विमर्श में शामिल क्यों नहीं करतीं? पिटी-पिटाई लकीर पर चलने वाले स्त्री-विमर्श में केवल भाषाई उद्दंडता और पुरुष-वमन के सिवाय कहीं कुछ भी वैचारिक या गंभीर नहीं है। स्त्री-विमर्श की चिंगारी को हर वक्त भड़काए रखने के लिए उसमें देह को और जोड़ दिया जाता है, ताकि प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की दुकानदारी मौज से चलती रही। आपको भले ही न लगे लेकिन मुझे यह देहवादयुक्त स्त्री-विमर्श हास्यास्पद ज्यादा नजर आता है। मेरा यह मानना है कि स्त्री-विमर्श पर चली रही कथित बौद्धिकता अपने आप में ही एक व्यंग्य है।
यहां एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या महिलाओं को व्यंग्य की आदत नहीं? याकि व्यंग्य कहने-लिखने से वो डरती हैं? जबकि मेरा मत यह है कि पुरुष से कहीं ज्यादा प्रभावी ढंग से महिलाएं व्यंग्य को कह-लिख सकती हैं। पुरुष-सत्ता के वर्चस्व को अप्रभावी बनाने के लिए व्यंग्य से प्रभावी कोई हथियार नहीं हो सकता। व्यंग्य में बहुत ताकत है। व्यंग्य राजनीतिक सत्ता को ही नहीं सामाजिक गड़बड़ियों को भी बहुत सशक्त ढंग से नंगा कर सकता है। जिन चीजों को आप बहुत आक्रामक होकर नहीं कह सकते क्यों न उसे व्यंग्य के माध्यम से कह दिया जाए, यह असर व्यंग्य में रहता है। लेकिन स्त्री-विमर्श में संलग्न महिलाओं को तो आक्रमक होने से ही फुर्सत नहीं, वो भला क्यों व्यंग्य पर सहमति बनाएंगी?
इसे विडंबना ही कहा-मना जाएगा कि यहां हर महिला स्त्री-विमर्श में आने के लिए तो बेताव रहती है, मगर व्यंग्य के क्षेत्र में आने की कभी नहीं सोचती। (कृपया, इसमें लाफटर चैलेंज पर परोसी जाने वाली हंसी की फूहड़ता को शामिल न करें)। अगर महिलाएं ऐसा सोचती हैं कि वो पुरुष-सत्ता के खिलाफ क्रांति सिर्फ स्त्री-विमर्श के माध्यम से ही कर सकती है, तो यह उसकी खामाख्याली है। इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार वे 'महान' और 'बड़ी' लेखिकाएं हैं, जो स्त्री-विमर्श की थकी हुई गाड़ी को सिर्फ अपने फायदे के लिए चलाती रहना चाहती हैं। ताकि उनका नाम पत्र-पत्रिकाओं में बना रहे। हंस जैसी देहवादी पत्रिका उनके देह-विमर्श को चाट-मसाले की तरह छापे। वे उसके छपने का सुख भोंगे और महिलाओं के असली मुद्दे देह की आड़ में दबे-छिपे रह जाएं।
दरअसल, महिलाओं ने अपनी गत खुद गंवाई है। करती स्त्री-विमर्श हैं मगर सुख उन्हें पुरुष की गोद में बैठकर ही मिलता है। फिर क्या फायदा और क्या महत्व है, ऐसे रद्दी स्त्री-विमर्श का?
क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि महिलाएं पुरुषों पर खुलकर खुला व्यंग्य कहने-लिखने से कतराती हैं? उन्हें हर वक्त यह डर घेरे रहता है कि उनका व्यंग्य कहीं पुरुष को उनके खिलाफ और भड़का न दे! जो महिलाएं ऐसा सोचती हैं उनसे मेरा कहना है कि पुरुष अपने आपमें सबसे भड़कीला प्राणी है। सर के बाल से लेकर पैर के नाखून तक बात-बेबात भड़कने को उसने अपनी आदत बना लिया। पुरुष का भड़कना स्त्री में भय पैदा करता है। यही भय उसकी स्वतंत्रता के लिए घातक है।
महिलाएं अगर व्यंग्य लिखने लगें तो पुरुष को अपनी व्यंग्य-सत्ता का खतरा जरूर पैदा हो जाएगा। महिलाओं की जिन बातों-आदतों पर अक्सर पुरुष ही व्यंग्य करता रहता है अगर महिलाएं उसकी बातों-आदतों पर अपने हिसाब से लिखेंगी तो उसका लुत्फ ही कुछ और होगा। महिलाओं के पास अपनी त्रासदियों का लंबा अनुभव है। यह त्रासदियां उसे जितनी पुरुष से मिली हैं लगभग उतनी ही धर्म से भी। हर धर्म में स्त्री प्रताड़ित और गुलाम है। कोई भी धर्म स्त्री को स्वतंत्र रहने की स्वतंत्रता नहीं देता। धर्म पर स्त्री का व्यंग्यात्मक प्रहार बहुत हद तक धर्म की चूलों को हिला सकता है। काबिले-गौर यह है कि आधुनिक और उत्तर-आधुनिक स्त्री-विमर्श ने भी कभी कोशिश नहीं की धर्म के खिलाफ महिलाओं को व्यंग्यात्मक रूप से खड़ा करने की। जहां धर्म की बात आती स्त्री-विमर्श चूहा बन जाता है। यह बात दीगर है कि कभी कोई स्त्री किसी दूसरी स्त्री से धर्म की कूपमंडुकताओं को त्यागने के लिए नहीं कहती। बस जैसा मां ने बता-समझा दिया बेटी को भी वैसा ही मानना है। उसके लिए पति परमेश्वर है, धर्म आस्था का मूल-मंत्र।
खास बात, पति के परमेश्वर होने और हिंसक होने में उसे कहीं कोई अंतर दिखाई नहीं पड़ता। उसे दोनों ही स्वीकार्य हैं। क्या यहां आपको नहीं लगता कि महिलाओं को अब इन थोपी गईं परंपराओं, स्थापनाओं को जबरदस्ती तोड़ देना चाहिए? उसे खुलकर इन सब पर व्यंग्य करना ही नहीं लिखना भी चाहिए। क्योंकि हमने देख-समझ लिया है कि चंद प्रगतिशील सुविधासंपन्नों के देहवादी स्त्री-विमर्श से कुछ होने-हवाने वाला नहीं। ये स्त्री-विमर्श स्त्रियों को बरगला रहा है।
क्यों न समझदार महिलाएं कोशिश करें इस फालतू के स्त्री-विमर्श से बाहर आकर व्यंग्यात्मक विमर्श को बनाने की। आज जिस तदाद में पुरुष व्यंग्य लिख रहे हैं उससे कहीं ज्यादा तदाद महिलाओं की हो तो मजा आएगा वैचारिक टकराहट में। हां, इस मामले में पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों को भी गंभीर होना पड़ेगा कि उनके यहां महिलाओं के भी व्यंग्य समानरूप से छपें। वे उन्हें व्यंग्य लिखने के लिए प्रेरित करें। जब महिलाएं स्त्री-विमर्श पर स्तंभ लिख सकती हैं तो फिर व्यंग्य का स्तंभ क्यों नहीं?
मेरा यह दावा है कि जिस दिन महिलाएं व्यंग्य के क्षेत्र में कदम रख देंगी, पुरुष व्यंग्यकारों को अपनी सत्ता के बारे में सोचना अवश्य पड़ेगा। क्यों न यह पहल अब हो ही जाए।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 9:35 PM 7 comments
Labels: बहस
Tuesday, December 22, 2009
नए चेहरों के साथ कितना बदल पाएगा भाजपा का चाल और चरित्र
अंततः लालकृष्ण आडवाणी युग का अंत भारतीय जनता पार्टी से हो ही गया। आडवाणी अब से भाजपा के लिए कुछ नहीं हैं; ठीक अटल बिहारी वाजपेई की तरह। पार्टी के भीतर-बाहर अब लालकृष्ण आडवाणी का नाम कम ही सुना-बोला जाएगा। दरअसल, यह समय की निर्ममता है कि वो किसी व्यक्ति अथवा युग को लंबे समय तक बने नहीं रहने देता। समय सबके लिखे का हिसाब-किताब रखता है। जिन्हें यह गुमान रहता है कि वक्त उनका कभी कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा, वो एक दिन खुद ही भीड़ में गुमनाम से हो जाते हैं। समय से लड़ने की जद्दोजहद में अपने अस्तित्व को ही नहीं बचा पाते। राजनीति से अच्छी समय की महत्ता को भला कौन समझ सकता है? राजनीति में व्यक्ति नेता तभी तक रहता है, जब तक समय उसका साथ देता है। जहां समय ने साथ देना बंद किया, नेता फिर से व्यक्ति के वेश में आकर अपनों के ही बीच गुमनाम-सा हो जाता है।
लालकृष्ण आडवाणी का भाजपा से जाना सवाल और आकलन तो बहुत छोड़ गया है, लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में उन सवालों और आकलनों की जरूरत इसलिए भी नहीं है, क्योंकि सत्ता में चीजें जितनी तेजी से बदलती हैं, उतनी ही तेजी से गुम भी हो जाती हैं। यहां पल-पल में बदलाव संभव हैं। बदलाव का दूसरा नाम ही शायद 'राजनीति' है।
आडवाणी युग का भाजपा में अंत हो जाने से पार्टी में कहीं कोई ठहराव दिखेगा, ऐसा लगता तो नहीं। यह बात सही है कि आडवाणी भाजपा के भीतर बहुत कुछ थे, पर इतने कुछ भी नहीं कि संघ परिवार से ऊंचे हो जाएं। आडवाणी का कद भाजपा में भले ही ऊंचा हो परंतु संघ परिवार में वह आम संघी जैसे ही थे। यह बात सब जानते हैं कि भाजपा में होने वाला कोई भी अंदरूनी या बाहरी परिवर्तन बिना संघ परिवार की अनुमति के हो ही नहीं सकता। संघ जिसे चाहेगा उसे सत्ता की चाभी सौंपने का अधिकार रखता है। अब कहने को भले ही संघ कहता रहे कि वो एक सांस्कृतिक संस्था है, लेकिन सांस्कृतिक संस्था होकर भी भाजपा में निरंतर चौकसी बनाए रखने का क्या मतलब है, भाई!
दरअसल, संघ की सांस्कृतिक और राजनीतिक संस्था कोई और नहीं भाजपा ही है। उसमें मौजूद कारिंदे संघ से शिक्षा-दिक्षा लिए हुए हैं। बिना संघ की अनुमति के वे न तो कुछ कर सकते हैं न बोल सकते। अब तक जितने भी कार्यकर्ता पार्टी या संघ के खिलाफ बोले हैं, उनका हश्र क्या हुआ, यह हम सब देख चुके हैं।
लालकृष्ण आडवाणी की भाजपा अध्यक्ष पद से छुट्टी हो जाना इस बार के चुनावों में ही तय हो गया था। देश के भीतर पार्टी को जिस तरह से करारी हार का सामना करना पड़ा, लग रहा था कि इसकी गाज आडवाणी और राजनाथ सिंह पर गिर सकती है। पार्टी में आए दिन सदस्यों के बीच चलने वाले वैचारिक व व्यक्तिगत मतभेद बताने के लिए काफी थे कि भाजपा में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। जसंवत सिंह, अरूण शौरी, उमा भारती आदि का आडवाणी और राजनाथ सिंह के खिलाफ बेरूखी का रूख रखना, समझने के लिए काफी था कि असहमतियों की खाई निरंतर गहराती जा रही है। कल तक जो पार्टी दूसरों को उनका चाल, चरित्र और चेहरा पहचानने का आदेश दिया करती थी, आज वो खुद ही अपने चाल, चरित्र और चेहरे को बचाने की चिंता में डुबी हुई है।
विचारधारा के संकट ने भी आडवाणी को कई दफा मुसिबत में डाला था। कई दफा तो वे खुद को सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष घोषित करने में इतने उत्तेजित हो गए कि जिन्ना को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताकर संघ परिवार से सीधा पंग ही मोल ले लिया। उनकी इस धर्मनिरपेक्ष छवि का संघ ने न केवल खुलकर विरोध किया, बल्कि हिदायत तक दे डाली कि वे अपने कहे पर पुर्नविचार करें।
यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि लालकृष्ण आडवाणी ने विचार या समाज की राजनीति कभी नहीं की। क्योंकि वे जिस संगठन से जुड़े रहे खुद उसमें कभी विचार या समाज की राजनीति को तरजीह नहीं दी गई। रथयात्रा को वे बेशक अपनी बड़ी उपलब्धि कहते-मानते रहें, लेकिन देश-समाज के भीतर सांप्रदायिक वैमनस्य की शुरुआत इसी यात्रा से हुई थी। उनकी यह यात्रा न जनता न ही किसी सामाजिक मुद्दे के लिए थी, उसका तो बस एक ही लक्ष्य था; सांप्रदायिकता के बीज को खाद-पानी देना। सांप्रदायिकता का वो बीज आज पेड़ बन चुका है। इस पेड़ की जद में आकर अब तक न जाने कितने लोग दब-मर चुके हैं, उसका कोई हिसाब-किताब भी उनके पास न होगा।
यहां काबिले-गौर प्रश्न यह है कि आडवाणी या राजनाथ सिंह के जाने के बाद भाजपा में कोई खास परिवर्तन आ पाएगा? क्या पार्टी के भीतर गहरे तक पैठ जमा चुकी कलह पर विराम लग सकेगा? क्या पार्टी व्यक्ति में बदलाव के साथ-साथ अपने विचारों को भी बदल पाएगी? वैसे तो ऐसा कुछ होगा नहीं, हां, अगर होता है, तो इसे महज चमत्कार ही मानिएगा। आखिर यह क्यों भूलते हैं कि नितिन गडकरी भाजपा की नहीं संघ परिवार की पसंद हैं। उन्हें संघ ने ही भाजपा के अध्यक्ष पद का ताज सौंपा है। फिर यह कैसे संभव है कि गडकरी संघ के फैसले या नियम के खिलाफ कोई भी फेर-बदल भाजपा में कर सकें। भाजपा में वही होगा जो संघ चाहेगा।
भाजपा में बस दो चेहरे नितिन गडकरी और सुषमा स्वराज के रूप में बदले हैं, पर चाल और चरित्र तो वही है। वो कहां बदला है।
यह आडवाणी युग के बाद की भाजपा का नया युग है। नए सदस्यों के साथ पार्टी का नया युग कितना प्रभावी, जनता और अपने सदस्यों के बीच, हो-बन पायगा यह हमें अभी देखना है।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 9:01 PM 3 comments
Labels: राजनीति
Monday, November 30, 2009
मीडिया का हेडली प्रसंग
इन दिनों मीडिया में हेडली-प्रसंग जोरों पर है। मीडिया अपनी हर खबर में 'हेडली का सच' हमें दिखा-बता रहा है। हेडली कहां गया। हेडली कहां से आया। हेडली कहां रहा। हेडली ने क्या खाया। हेडली ने कितनी दफा सांस ली-छोड़ी। हेडली की हैसियत क्या है। हेडली कैसा लगता-दिखता है। हेडली के इरादे क्या थे।
यकीन मानिए, इस वक्त मीडिया के लिए हेडली जबरदस्त 'ब्रेकिंग-खबर' है। कल तक हेडली को न जानने वाली जनता भी आज हेडली को अच्छी तरह से जान-समझ गई है। ज्यादा आश्चर्य में न पड़ जाइएगा अगर सड़क चलता कोई आपसे हेडली के बारे में पूछताछ करने लग जाए। दरअसल, बातें और खबरें जब मीडिया-मार्ग से होकर गुजरती हैं तो चर्चा पा ही जाती हैं। किसी (अ)मशहूर को अगर मशहूर बनाना हो तो मीडिया से अच्छा कोई साधन या जरिया नहीं।
देश की खुफिया एजेंसियां भी अक्सर सोचती होंगी कि हमसे तेज तो यह मीडिया है। जिसे पल-पल की खबर रहती है। बस अफसोस इतना भर है कि मीडिया प्रायः अपनी ही खबर नहीं रख पाता। दूसरे को आईने में देखना और खुद को आईने में देखने का फर्क बस यही है। हमारा मीडिया अपनी 'संयत निगाह' से नहीं, 'सनसनी निगाह' से चीजों को ज्यादा देखता-समझता है।
पता नहीं खुफिया एजेंसियों ने हेडली को देखा भी है या नहीं मगर हमारा मीडिया उसे देख चुका है। उसने जनता को उसका संभवतः काल्पनिक चित्र भी उपलब्ध करवा दिया है। चित्र के सहारे वो तो हेडली का चरित्र तक खंगाल लाया है। कुर्बान जाऊं मीडिया की इस तेजी पर!
मेरा मन भी मीडिया के हेडली-प्रसंग में खासा रमने लगा है। कोई और चारा भी नहीं है। क्योंकि जब भी टीवी का दरवाजा खुलता है, चौखट पर संवाददाता हेडली की रामायण वांच रहा होता है। हमें हेडली का जमा-हासिल बता रहा होता है। बीच-बीच में देश की खुफिया एजेंसियों को भी लताड़ लगा देता है। गृह-मंत्रालय की सुरक्षा-समीक्षा पर सवाल खड़े करता है। उसका आक्रोशित रूप-ढंग देखकर मैं सहम-सा जाता हूं कि कहीं अगर हेडली उसके सामने आ जाए तो क्या हो?
हेडली पर हर चैनल का अपनी तरह से वर्चस्व है। 26/11 के बाद से तो हमारा मीडिया कुछ ज्यादा ही देशभक्त हो-बन गया है। जहां कहीं आतंकी वारदात की भनक लगती है, मीडिया के कैमरे तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। संवाददाता बेहतरीन तरीके से खबर को कहानी बनाकर पेश करने की कोशिश किया करता है। हालांकि मेरे अंदर यह सब लिखने की काबलियत नहीं है अगर कोई चाहे तो उस बेहतरीन खबर पर एकाध जासूसी उपान्यास तो तैयार कर ही सकता है। निश्चित ही हमारे मीडिया में बहुत सारी अजब तरह की गजब संभवानाएं हैं।
हेडली-प्रसंग में जबसे महेश भट्ट के बेटे का नाम आया है, मीडिया कुछ ज्यादा ही उत्साहित-सा हो गया है। राहुल नाम का सस्पेंस खत्म हो गया है। उन राहुल को छोड़ मीडिया का सारा ध्यान अब इस राहुल पर आकर टिक गया है। मीडिया निरंतर प्रयासरत है जनता को राहुल के बारे में कुछ सनसनीखेज बताने को। अब बचारे राहुल की शामत आ ही गई समझिए। राहुल भले ही खुफिया एजेंसियों से बच जाए परंतु हमारे सबसे तेज मीडिया से चाहकर भी नहीं बच सकता है। किसी को भी न बचकर निकल देने में हमारे मीडिया को महारत हासिल है भाई। शायद इस मुस्तैदी को हमारा मीडिया अपनी टीआरपी का आईना समझकर देखता-परखता है।
चिदंबरम साहब यह क्यों नहीं करते कि खुफिया एजेंसियों को कुछ दिन की छुट्टी देकर सबसे तेज मीडिया को हेडली और नक्सलवादियों के पीछे लगा दें, ताकि पल-पल की खबर उनको मिलती-दिखती रहे। कभी-कभी यह खूबसूरत एहसास मन में जाग जाता है कि मीडिया हमारे देश की 'दूसरी खुफिया पुलिस' है। इस और उस पुलिस में अंतर बस इतना है कि वो घटनाक्रम के बाद घटनास्थल पर पहुंचती है और यह घटना को अपने कैमरे के सामने घटता हुआ दिखाती है। बीता 26/11 तो आपको याद है न!
फिलहाल, मीडिया की हेडली पर मेहनत जारी है। इंतजार करें इस प्रसंग में कुछ और सनसनीखेज खुलासों पर 'ब्रेकिंग खबर' बनने का।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 10:13 PM 3 comments
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Wednesday, November 18, 2009
अश्लीलता और आंखें
पता नहीं लोग कैसे कह देते हैं कि अश्लीलता समाज के लिए खतरा है! अश्लीलता देखने से बच्चे बिगड़ते हैं। अश्लील साहित्य दिमाग में गंदगी भर देता है। अश्लीलता से यह होता है। अश्लीलता से वो होता है। अश्लील चीजों व बातों पर पाबंदी लगनी चाहिए। जिसे देखो वो अश्लीलता के खिलाफ तीर-भला लिए खड़ा है।
मगर, मुझे ये सब बड़ा अटपटा-सा लगता है। भला अश्लीलता से भी समाज या बच्चे बिगड़ सकते हैं, बात कुछ हजम नहीं होती। अंधविश्वास की तरह अश्लीलता भी कुछ नहीं होती। अश्लीलता सिर्फ हमारी आंखों का धोखा है। दोष अश्लीलता में नहीं दरअसल हमारी नंगी आंखों में है। देश-समाज में अब तक जाने कितने आंदोलन अश्लीलता के खिलाफ हुए हैं, परंतु आज तक एक भी आंदोलन इंसान की नंगी आंखों के खिलाफ कहीं नहीं हुआ है। क्यों? अश्लीलता को दोषी मानने से पहले क्या हमें अपनी आंखों को दोषी नहीं करार देना चाहिए? दरअसल, समाज में अश्लीलता के नाम पर सारी गड़बड़ और गंदगी फैलाई हमारी-आपकी आंखों ने ही है। हम अश्लीलता पर कपड़े डालने की बात तो कहते हैं, परंतु अपनी आंखों पर परदा डालने से कतराते रहते हैं।
अश्लीलता शालीनता का ही विस्तृत रूप है। अश्लीलता में शालीनता छिपी होती है; ऐसा हमारे प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का मानना है। प्रगतिशीलों को मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों में अश्लीलता नहीं, कला नजर आती है। लेकिन फिल्म में या रैंप पर अगर किसी अभिनेत्री का कपड़ा सरक जाता है, तो उसे तुरंत अश्लील करार दिया जाता है। बिडंवना देखिए, फिदा हुसैन अपनी नंगी तस्वीरों पर विदेशों में डालर कमाते हैं और एक हम हैं, जो बिग बॉस पर हर दम अश्लीलता का ताना कसते रहते हैं। यह तो सरासर भेदभाव है बंधु।
हमारे जैसे लोकतांत्रिक मुल्क में अश्लीलता-फश्लीलता पर हो-हंगामा कटना कतई शोभा नहीं देता। लोकतंत्र कहता है कि यहां सब सबकुछ कहने, खाने, पीने, पहनने और दिखाने की स्वतंत्रता है। बावजूद इस 'लोकतांत्रिक सच' के हम बेचारी अश्लीलता पर निरंतर चाबुक चलाते रहते हैं।
वैसे। सच कहूं, तो मुझे समाज में कहीं अश्लीलता नजर नहीं आती। हां, कथित शालीन चीजें मुझे जरूर अश्लील नजर आती हैं। बेशक हमारे बाबा रामदेव पूरी दुनिया को योग सिखाते हों लेकिन अपनी मां-बहनों के सामने यूं नंगे बदन जाना, उन्हें शोभा नहीं देता। अगर कहीं ऐसी स्थिति में यही योग राखी सावंत या शिल्पा शेट्टी हमें सिखा रही होतीं, तब जाने क्या से क्या हो जाता? आप समझ सकते हैं। आप मानो या न मानो लेकिन आज वो ही सबसे अधिक अश्लील है, जो दुनिया के आगे शालीन बना हुआ है।
हमें कितना सुखद लगता है, नंगे बदन सलमान या शाहरूख खान को नाचते-गाते देखना। फिर गाहे-बगाहे अश्लीलता के नाम पर होने वाले इस तमाशे का क्या मतलब है भाई!
मैं फिर कहूंगा दोष अश्लीलता में नहीं, हमारी नंगी आंखों में है। नंगी चीज नंगई को ही पसंद करेगी। क्या करें अपनी आदत से मजबूर जो है। क्यों नहीं इंसान अपनी कुछ 'वैज्ञानिक बुद्धि' आंखों को कपड़े पहनाने में नहीं खर्च करता। इस विषय पर बड़ा और गंभीर शोध हो सकता है। जिस दिन इंसान की आंखों पर 'पूर्ण पर्दा' पड़ जाएगा, उस दिन से समाज या फिल्मों में अश्लीलता या नंगई पर उठने-मचने वाला हो-हल्ला भी खत्म हो जाएगा। तब यह होगा। आप कुछ पहनो या न पहनो, सब शालीनता के दायरे में ही आएगा।
फिलहाल, तो अभी उस दिन का हम-आप इंतजार ही कर सकते हैं।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 12:18 AM 4 comments
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Thursday, November 12, 2009
भाषा रहेगी तो हम भी रहेंगे
यह कहीं किसी दूसरे देश में हुआ होता तो बात समझी जा सकती थी परंतु यह सब अपने 'लोकतांत्रिक देश' में हुआ तो शर्म नहीं घृणा होती है। घृणा होती है क्षुद्र राजनीति से। घृणा होती है भाषाई हिटलरशाही से। घृणा होती है अलोकतांत्रिक वर्चस्व से। घृणा होती है क्षेत्रवाद की राजनीति से। महाराष्ट्र विधानसभा में हिंदी भाषा के बहाने जो उत्पात मचाया गया उसने न सिर्फ संसद की गरिमा का मजाक उड़ाया बल्कि देश में 'भाषाई विभाजन' की आग भी सुलगाई। देश या संसद में कौन-सी भाषा को बोलना या अपनाना चाहिए यह क्या मुट्ठीभर मनसे के गुरगे तय करेंगे? क्या अब वे हमें भाषा की तमीज सिखाएंगे? क्या संविधान के सिद्धांतों-नियमों को उनकी 'बेहूदा भाषाई जिद्द' से घबराकर बदल देना पड़ेगा? आखिर वे हैं कौन और देश-समाज में उनकी हैसियत ही क्या है?
महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी भाषा का मुद्दा कई दिनों से गरमाया हुआ है। कभी इसका शिकार बिहारवाले होते हैं, तो कभी उत्तर प्रदेशवाले। गैर-मराठी भाषी लोगों को लाठी-डंडे के दम पर हड़काया जाता है कि तुम या तो मराठी अपनाओ या फिर लाठी खाओ। भाषा को भी ये उद्दंड जमाते अपने लाठी-डंडों के बल पर कैद कर देना चाहती हैं। यहां बात को तुरंत ही मराठी अस्मिता से जोड़ दिया जाता है। क्या मराठी अस्मिता का हित गैर-मराठी लोगों पर डंडे बरसाने में निहित है? क्या मराठी भाषा तब ही जीवित रह सकती है, जब तक गैर-मराठी लोगों को मारा-तोड़ा न जाए? मसने का यह आचरण गुंडागर्दी का जीता-जागता सबूत है। वह तो शिवसेना से भी दो कदम आगे निकल चुकी है।
भाषा, मराठी या हिंदी, किन्हीं नेताओं या संगठनों की गुलाम नहीं होतीं। भाषा अपने सहज संप्रेषण से हर कहीं विस्तार पाती है। पाती रही है। भाषा में प्रयोग तो हो सकते हैं, परंतु उसमें तोड़-मरोड़ कतई नहीं। फिर किसी भाषा को किन्हीं राज्यों-क्षेत्रों तक सीमित कर देना बेहद शर्मनाक है। आज ठाकरे बंधु जिस बेहूदगी का परिचय हिंदी भाषा-भाषीयों के साथ दे रहे हैं, क्या वे बताएंगे कि उनके बच्चे स्कूलों में किस 'खास भाषा' में शिक्षा लेते हैं? क्या केवल मराठी पढ़कर ही वे कामयाबी की जंग जीत लेंगे? इससे भी इतर, हिंदी भाषा को अपमान की दृष्टि से देखने वाले ठाकरे यह भी बताएं कि उन्होंने मराठी भाषा के हित में महाराष्ट्र या देश भर में अब तक क्या-क्या किया है? जिस तेजी से हर रोज भाषाएं मर रही हैं, उसमें मराठी भाषा अपवाद बनी रहेगी ऐसा भ्रम ठाकरे या शिवसेना न पाले। हिंदी और मराठी दोनों ही भाषाओं को अंग्रेजी की दीमक चट कर रही है। अगर उनमें हिम्मत है तो अंग्रेजी के प्रभुत्व को देश-समाज से खत्म करके दिखाएं। लाठी-डंडों के बल पर भाषाओं को न तो अपनाया जा सकता है न ही उनका विस्तार किया जा सकता है।
न महाराष्ट्र और न ही मराठी भाषा ठाकरे खानदान की बपौती है। भाषा को एक राज्य और उसके लोगों तक सीमित कर वे लोकतंत्र में 'भाषा की स्वतंत्रता' का सरेआम मजाक उड़ा रहे हैं। आखिर यह कहां और किस कानून में लिखा है कि महाराष्ट्र में रहने के लिए मराठी भाषी होना ही जरूरी है? हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं का देश है, यहां किसी एक भाषा, जाति, संप्रदाय, धर्म या व्यक्ति की हुकूमत कभी नहीं चल सकती। एक अपने ही नहीं कहीं भी, किसी भी देश में देख लीजिए, जहां भाषा ने किसी व्यक्ति या समाज को तोड़ने का प्रयास किया हो। भाषा ठीक संस्कृति की तरह है, जो निरंतर विस्तार पाती रहती है। भाषा जोड़ने का काम करती है, तोड़ने का नहीं।
महाराष्ट्र प्रसंग पर देश में अब 'भाषा पर राजनीति' शुरू हो गई है। राजनीतिक दल कैसे भी इस मुद्दे को बस अपने हितों के वास्ते भुना लेना चाहते हैं। वे भाषा के अपमान या मनसे की उद्दंडता पर गंभीर नहीं हैं, उनमें बेचैनी हैं, अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियों को सेंकने की। मीडिया के सामने ठाकरे या मनसे विरोधी बयान देकर वे जनता की निगाहों में 'महान' हो जाना चाहते हैं। वे आज से पहले कभी खत्म होती भाषाओं पर गंभीर या बेचैन नहीं हुए, आखिर क्यों? क्या कभी उन्हें ऐसा नहीं महसूस हुआ कि मराठी या हिंदी केवल खास राज्यों या क्षेत्रों की नहीं, बल्कि पूरे देश की भाषाएं हैं। इन पर राजनीति नहीं, इनके विस्तार पर बल चाहिए है।
दरअसल, इतनी अक्ल न ठाकरे में है, न राजनेताओं में कि भाषाएं जीवित रहेंगी, तब ही हम जीवित रह सकेंगे। भाषा का सीधा संबंध इंसान के आचरण, व्यवहार और जीवन से है। जब किसी भाषा को बोलने-समझने वाले ही नहीं होंगे, तो भाषाओं पर छिड़े युद्ध भला क्या करे लेंगे? वे चूंकि सिर्फ राजनीति की भाषा जानते हैं, इसलिए उन्हें भाषा की गंभीरता समझ नहीं आएगी।
केंद्र सरकार के लिए महाराष्ट्र की घटना क्या मायने रखती है, इस पर ज्यादा कुछ सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि राजनीतिक दल लोकतंत्र से कहीं ज्यादा अपने-अपने हितों का ध्यान रखते हैं। फिर यह मामला हिंदी से जुड़ा है, हां, अगर इज्जत कहीं अंग्रेजी की चली गई होती तो सरकार ही क्या तमाम अंग्रेजी के अखबार और अंग्रेजीदां बुद्धिजीवि लोकतंत्र में भाषा की अभिव्यक्ति की दुहाई दे-देकर जाने क्या से क्या कर डालते! आखिर हम मनसे को ही क्यों दोष दें। हम अपने गिरेबानों में झांकने का प्रयास क्यों नहीं करते कि हम खुद भाषाओं की कितनी दुर्गति कर रहे हैं। हमने भाषाओं के शरीर ही नहीं, उनकी आत्माओं तक से बलात्कार किया है।
कुछ दिनों बाद अन्य मामलों की तरह यह मामला भी शांत हो जाएगा परंतु भाषाओं के साथ जिस उद्दंडता का व्यवहार हम-आप कर रहे हैं, शायद एक दिन भाषाएं भी हमें इस कृत्य के लिए कभी माफ न करे!
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 9:19 PM 3 comments
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Friday, November 6, 2009
हिंदुस्तान में सब भ्रष्ट हैं!
सुप्रिम कोर्ट के जज मार्कंडेय काटजू ने भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'हिंदुस्तान में सब लोग भ्रष्ट हैं। ये भ्रष्टाचार कभी ठीक नहीं हो सकता। मेरा वहम था कि मैं भ्रष्ट लोगों को ठीक कर सकता हूं। अब मैं समझ गया कि भ्रष्ट लोगों को ठीक करने का कोई चारा नहीं।' साफ समझा जा सकता है कि जस्टिस काटजू भ्रष्टाचार से बेहद आहत हैं। उन्होंने यह मान लिया है कि यह बीमारी लाइलाज है। हमें हर वक्त इसी दलदल में धंसे रहकर अपने कामों व जिंदगी को चलाए रखना है।
हमारे आस-पास भ्रष्टाचार का साम्राज्य जिस तेजी से फैल रहा है, उस आधार पर अब इसे सिर्फ समस्या नहीं माना जा सकता। यह समस्या से बहुत आगे बढ़ चुका है। भ्रष्टाचार सिर्फ केंद्रों या राज्यों को ही प्रभावित नहीं कर रहा वो देश व समाज के हर आमो-खास को निगल रहा है। आप कहीं भी आंख उठाकर देख लीजिए हर तरफ भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। सिर्फ सरकारी दफ्तरों में ही नहीं निजी क्षेत्रों में भी भ्रष्टाचार अपने पैर पसार चुका है। बेशक, हम यह कहकर अपना पिंड छुड़ा लेते हैं कि सामाजिक व राजनीति व्यवस्था ही इसके लिए जिम्मेदार है। राजनीति व अफसरशाही में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है। लेकिन सवाल यहां यह पैदा होता है कि इस व्यवस्था को बनाने या पैदा करने वाले लोग तो हम-आप ही हैं। समाज और राजनीति के भीतर ऐसी व्यवस्था को लाने व फैलाने में कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं। हम इस व्यवस्था से अलग की चीज नहीं हैं।
भ्रष्टाचार का एक खास कारण 'असमानता' भी है। असमानता कद और कुर्सी की। छोटे और बड़े की। राजनेता और आम आदमी की। ताकतवर और कमजोर की। बेईमान और ईमानदार की। ये असमानताएं कहीं न कहीं व्यक्ति के भीतर दूसरे से श्रेष्ठ हो-बन जाने का लालच भी पैदा करती हैं। सारा का सारा झुकाव बस इस बात पर बना रहता है कि पैसा आना चाहिए। चाहे कहीं से और कैसे भी। ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की होड़ ही हमें भ्रष्टाचार की अंधी गलियों में ला पटकती है। देश और समाज के भीतर जिस तरह से रहने-खाने-पीने की स्थितियां बदल रही हैं, ये भी भ्रष्टाचार को कहीं न कहीं दावत दे रही हैं।
सरकारें भ्रष्टाचार पर सिवाय बयान देने के कुछ नहीं करतीं। मंत्री और नेता जनता से तो ईमानदार बनने का आह्वान करते हैं किंतु खुद वे भ्रष्टाचार के हमाम में नंगे रहना पसंद करते हैं। अब तो हमारे बीच इस धारणा ने जोर पकड़ लिया है कि जो नेता या मंत्री जितना भ्रष्ट या बेईमान होगा वो उतना ही बड़ा समाज व देशसेवक होगा। यानी अब देश और समाज से कहीं ज्यादा बड़ा नेताओं का 'भ्रष्ट चरित्र' हो गया है। राजनीति में चरित्र के क्या मायने रह गए हैं, इसे बताने की जरूरत नहीं।
मधु कोड़ा के मामले के बाद एक दफा हम फिर से भ्रष्टाचार पर सख्ती से बोलने व सोचने लगे हैं। बुद्धिजीवि भ्रष्टाचार के खातमें पर कलम तोड़ रहे हैं। तथाकथित समाजसेवक मूल्यों की ओर पुनः लौटने की बात कर रहे हैं। मीडिया अपनी गा-बजा रहा है। लेकिन देश का गरीब खामोशी से सबकुछ सुन और देख रहा है। क्योंकि उसे मालूम है कि वो जितना दिमाग भ्रष्टाचार के हानि-लाभ पर खर्च करेगा उतने समय में तो दो वक्त की रोटी की जुगाड़ कर लेगा।
मधु कोड़ा के पास से अब तक जितना भी धन-संपत्ति बरामाद हुई है, वो ऐसे पूर्व मुख्यमंत्री की है, जिसने जनता के हितों के लिए उससे वोट के रूप में उसका सहारा मांगा था। जनता ने जब उन्हें अपना सहारा दिया। उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। उसकी कीमत जनता को भ्रष्टाचार के रूप में मिली। मधु कोड़ा का कुछ नहीं गया लेकिन जनता का बहुत कुछ चला गया। उसके अधिकार उसके सम्मान का मजाक उड़ाया है मधु कोड़ा ने।
यह हमारी भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था का कोढ़ है, जिससे मधु कोड़ा जैसे भ्रष्ट नेता ग्रासित हैं। जिस देश का नेता खुद ही बेईमान बनकर जनता को लूटने-खसोटने में लगा हो ऐसी राजनीति या लोकतंत्र में भला किसे और क्यों आस्था हो सकती है? कानून चाहे भ्रष्टाचार पर सख्त हो या भ्रष्टाचारी पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सबकी चमड़ियां मोटी हो चुकी हैं। फिर हम यह भी कैसे मान लें कि कानून या न्याय-व्यवस्था में भ्रष्टाचार नहीं है? कचहरियों में फाइलों को एक हाथ से दूसरे हाथ में देने की कीमत क्या होती है, इससे हम बखूबी परिचित हैं। मगर इसके खिलाफ सुनवाई तो कहीं नहीं होती। हां, अगर कहीं कोई अपवाद सरीखा निकल जाए तो बात दूसरी है।
लगता है भ्रष्टाचार देश की जरूरत बन चुका है। हम इसके आदी हो चुके हैं। शिकायत हम इसलिए नहीं करते क्योंकि हमें अपने काम को जल्दी से जल्दी करवाने की तमन्ना रहती है। काम बनते ही न भ्रष्टाचार पर कोई अफसोस जताता है न ही भ्रष्टाचारी को कोई कोसता। यहां सबकुछ भगवान भरोसे चल और निभ रहा है।
अब इतनी व्याप्क 'भ्रष्टाचारी संस्कृति' पर जस्टिस काटजू को अगर यह कहना पड़े कि 'हिंदुस्तान में सब भ्रष्ट हैं' तो हमें कोई अफसोस नहीं होना चाहिए। वह काफी हद तक ठीक भी हैं।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 1:02 AM 1 comments
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