पता नहीं लोग कैसे कह देते हैं कि अश्लीलता समाज के लिए खतरा है! अश्लीलता देखने से बच्चे बिगड़ते हैं। अश्लील साहित्य दिमाग में गंदगी भर देता है। अश्लीलता से यह होता है। अश्लीलता से वो होता है। अश्लील चीजों व बातों पर पाबंदी लगनी चाहिए। जिसे देखो वो अश्लीलता के खिलाफ तीर-भला लिए खड़ा है।
मगर, मुझे ये सब बड़ा अटपटा-सा लगता है। भला अश्लीलता से भी समाज या बच्चे बिगड़ सकते हैं, बात कुछ हजम नहीं होती। अंधविश्वास की तरह अश्लीलता भी कुछ नहीं होती। अश्लीलता सिर्फ हमारी आंखों का धोखा है। दोष अश्लीलता में नहीं दरअसल हमारी नंगी आंखों में है। देश-समाज में अब तक जाने कितने आंदोलन अश्लीलता के खिलाफ हुए हैं, परंतु आज तक एक भी आंदोलन इंसान की नंगी आंखों के खिलाफ कहीं नहीं हुआ है। क्यों? अश्लीलता को दोषी मानने से पहले क्या हमें अपनी आंखों को दोषी नहीं करार देना चाहिए? दरअसल, समाज में अश्लीलता के नाम पर सारी गड़बड़ और गंदगी फैलाई हमारी-आपकी आंखों ने ही है। हम अश्लीलता पर कपड़े डालने की बात तो कहते हैं, परंतु अपनी आंखों पर परदा डालने से कतराते रहते हैं।
अश्लीलता शालीनता का ही विस्तृत रूप है। अश्लीलता में शालीनता छिपी होती है; ऐसा हमारे प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का मानना है। प्रगतिशीलों को मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों में अश्लीलता नहीं, कला नजर आती है। लेकिन फिल्म में या रैंप पर अगर किसी अभिनेत्री का कपड़ा सरक जाता है, तो उसे तुरंत अश्लील करार दिया जाता है। बिडंवना देखिए, फिदा हुसैन अपनी नंगी तस्वीरों पर विदेशों में डालर कमाते हैं और एक हम हैं, जो बिग बॉस पर हर दम अश्लीलता का ताना कसते रहते हैं। यह तो सरासर भेदभाव है बंधु।
हमारे जैसे लोकतांत्रिक मुल्क में अश्लीलता-फश्लीलता पर हो-हंगामा कटना कतई शोभा नहीं देता। लोकतंत्र कहता है कि यहां सब सबकुछ कहने, खाने, पीने, पहनने और दिखाने की स्वतंत्रता है। बावजूद इस 'लोकतांत्रिक सच' के हम बेचारी अश्लीलता पर निरंतर चाबुक चलाते रहते हैं।
वैसे। सच कहूं, तो मुझे समाज में कहीं अश्लीलता नजर नहीं आती। हां, कथित शालीन चीजें मुझे जरूर अश्लील नजर आती हैं। बेशक हमारे बाबा रामदेव पूरी दुनिया को योग सिखाते हों लेकिन अपनी मां-बहनों के सामने यूं नंगे बदन जाना, उन्हें शोभा नहीं देता। अगर कहीं ऐसी स्थिति में यही योग राखी सावंत या शिल्पा शेट्टी हमें सिखा रही होतीं, तब जाने क्या से क्या हो जाता? आप समझ सकते हैं। आप मानो या न मानो लेकिन आज वो ही सबसे अधिक अश्लील है, जो दुनिया के आगे शालीन बना हुआ है।
हमें कितना सुखद लगता है, नंगे बदन सलमान या शाहरूख खान को नाचते-गाते देखना। फिर गाहे-बगाहे अश्लीलता के नाम पर होने वाले इस तमाशे का क्या मतलब है भाई!
मैं फिर कहूंगा दोष अश्लीलता में नहीं, हमारी नंगी आंखों में है। नंगी चीज नंगई को ही पसंद करेगी। क्या करें अपनी आदत से मजबूर जो है। क्यों नहीं इंसान अपनी कुछ 'वैज्ञानिक बुद्धि' आंखों को कपड़े पहनाने में नहीं खर्च करता। इस विषय पर बड़ा और गंभीर शोध हो सकता है। जिस दिन इंसान की आंखों पर 'पूर्ण पर्दा' पड़ जाएगा, उस दिन से समाज या फिल्मों में अश्लीलता या नंगई पर उठने-मचने वाला हो-हल्ला भी खत्म हो जाएगा। तब यह होगा। आप कुछ पहनो या न पहनो, सब शालीनता के दायरे में ही आएगा।
फिलहाल, तो अभी उस दिन का हम-आप इंतजार ही कर सकते हैं।
Wednesday, November 18, 2009
अश्लीलता और आंखें
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 12:18 AM 3 comments
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Thursday, November 12, 2009
भाषा रहेगी तो हम भी रहेंगे
यह कहीं किसी दूसरे देश में हुआ होता तो बात समझी जा सकती थी परंतु यह सब अपने 'लोकतांत्रिक देश' में हुआ तो शर्म नहीं घृणा होती है। घृणा होती है क्षुद्र राजनीति से। घृणा होती है भाषाई हिटलरशाही से। घृणा होती है अलोकतांत्रिक वर्चस्व से। घृणा होती है क्षेत्रवाद की राजनीति से। महाराष्ट्र विधानसभा में हिंदी भाषा के बहाने जो उत्पात मचाया गया उसने न सिर्फ संसद की गरिमा का मजाक उड़ाया बल्कि देश में 'भाषाई विभाजन' की आग भी सुलगाई। देश या संसद में कौन-सी भाषा को बोलना या अपनाना चाहिए यह क्या मुट्ठीभर मनसे के गुरगे तय करेंगे? क्या अब वे हमें भाषा की तमीज सिखाएंगे? क्या संविधान के सिद्धांतों-नियमों को उनकी 'बेहूदा भाषाई जिद्द' से घबराकर बदल देना पड़ेगा? आखिर वे हैं कौन और देश-समाज में उनकी हैसियत ही क्या है?
महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी भाषा का मुद्दा कई दिनों से गरमाया हुआ है। कभी इसका शिकार बिहारवाले होते हैं, तो कभी उत्तर प्रदेशवाले। गैर-मराठी भाषी लोगों को लाठी-डंडे के दम पर हड़काया जाता है कि तुम या तो मराठी अपनाओ या फिर लाठी खाओ। भाषा को भी ये उद्दंड जमाते अपने लाठी-डंडों के बल पर कैद कर देना चाहती हैं। यहां बात को तुरंत ही मराठी अस्मिता से जोड़ दिया जाता है। क्या मराठी अस्मिता का हित गैर-मराठी लोगों पर डंडे बरसाने में निहित है? क्या मराठी भाषा तब ही जीवित रह सकती है, जब तक गैर-मराठी लोगों को मारा-तोड़ा न जाए? मसने का यह आचरण गुंडागर्दी का जीता-जागता सबूत है। वह तो शिवसेना से भी दो कदम आगे निकल चुकी है।
भाषा, मराठी या हिंदी, किन्हीं नेताओं या संगठनों की गुलाम नहीं होतीं। भाषा अपने सहज संप्रेषण से हर कहीं विस्तार पाती है। पाती रही है। भाषा में प्रयोग तो हो सकते हैं, परंतु उसमें तोड़-मरोड़ कतई नहीं। फिर किसी भाषा को किन्हीं राज्यों-क्षेत्रों तक सीमित कर देना बेहद शर्मनाक है। आज ठाकरे बंधु जिस बेहूदगी का परिचय हिंदी भाषा-भाषीयों के साथ दे रहे हैं, क्या वे बताएंगे कि उनके बच्चे स्कूलों में किस 'खास भाषा' में शिक्षा लेते हैं? क्या केवल मराठी पढ़कर ही वे कामयाबी की जंग जीत लेंगे? इससे भी इतर, हिंदी भाषा को अपमान की दृष्टि से देखने वाले ठाकरे यह भी बताएं कि उन्होंने मराठी भाषा के हित में महाराष्ट्र या देश भर में अब तक क्या-क्या किया है? जिस तेजी से हर रोज भाषाएं मर रही हैं, उसमें मराठी भाषा अपवाद बनी रहेगी ऐसा भ्रम ठाकरे या शिवसेना न पाले। हिंदी और मराठी दोनों ही भाषाओं को अंग्रेजी की दीमक चट कर रही है। अगर उनमें हिम्मत है तो अंग्रेजी के प्रभुत्व को देश-समाज से खत्म करके दिखाएं। लाठी-डंडों के बल पर भाषाओं को न तो अपनाया जा सकता है न ही उनका विस्तार किया जा सकता है।
न महाराष्ट्र और न ही मराठी भाषा ठाकरे खानदान की बपौती है। भाषा को एक राज्य और उसके लोगों तक सीमित कर वे लोकतंत्र में 'भाषा की स्वतंत्रता' का सरेआम मजाक उड़ा रहे हैं। आखिर यह कहां और किस कानून में लिखा है कि महाराष्ट्र में रहने के लिए मराठी भाषी होना ही जरूरी है? हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं का देश है, यहां किसी एक भाषा, जाति, संप्रदाय, धर्म या व्यक्ति की हुकूमत कभी नहीं चल सकती। एक अपने ही नहीं कहीं भी, किसी भी देश में देख लीजिए, जहां भाषा ने किसी व्यक्ति या समाज को तोड़ने का प्रयास किया हो। भाषा ठीक संस्कृति की तरह है, जो निरंतर विस्तार पाती रहती है। भाषा जोड़ने का काम करती है, तोड़ने का नहीं।
महाराष्ट्र प्रसंग पर देश में अब 'भाषा पर राजनीति' शुरू हो गई है। राजनीतिक दल कैसे भी इस मुद्दे को बस अपने हितों के वास्ते भुना लेना चाहते हैं। वे भाषा के अपमान या मनसे की उद्दंडता पर गंभीर नहीं हैं, उनमें बेचैनी हैं, अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियों को सेंकने की। मीडिया के सामने ठाकरे या मनसे विरोधी बयान देकर वे जनता की निगाहों में 'महान' हो जाना चाहते हैं। वे आज से पहले कभी खत्म होती भाषाओं पर गंभीर या बेचैन नहीं हुए, आखिर क्यों? क्या कभी उन्हें ऐसा नहीं महसूस हुआ कि मराठी या हिंदी केवल खास राज्यों या क्षेत्रों की नहीं, बल्कि पूरे देश की भाषाएं हैं। इन पर राजनीति नहीं, इनके विस्तार पर बल चाहिए है।
दरअसल, इतनी अक्ल न ठाकरे में है, न राजनेताओं में कि भाषाएं जीवित रहेंगी, तब ही हम जीवित रह सकेंगे। भाषा का सीधा संबंध इंसान के आचरण, व्यवहार और जीवन से है। जब किसी भाषा को बोलने-समझने वाले ही नहीं होंगे, तो भाषाओं पर छिड़े युद्ध भला क्या करे लेंगे? वे चूंकि सिर्फ राजनीति की भाषा जानते हैं, इसलिए उन्हें भाषा की गंभीरता समझ नहीं आएगी।
केंद्र सरकार के लिए महाराष्ट्र की घटना क्या मायने रखती है, इस पर ज्यादा कुछ सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि राजनीतिक दल लोकतंत्र से कहीं ज्यादा अपने-अपने हितों का ध्यान रखते हैं। फिर यह मामला हिंदी से जुड़ा है, हां, अगर इज्जत कहीं अंग्रेजी की चली गई होती तो सरकार ही क्या तमाम अंग्रेजी के अखबार और अंग्रेजीदां बुद्धिजीवि लोकतंत्र में भाषा की अभिव्यक्ति की दुहाई दे-देकर जाने क्या से क्या कर डालते! आखिर हम मनसे को ही क्यों दोष दें। हम अपने गिरेबानों में झांकने का प्रयास क्यों नहीं करते कि हम खुद भाषाओं की कितनी दुर्गति कर रहे हैं। हमने भाषाओं के शरीर ही नहीं, उनकी आत्माओं तक से बलात्कार किया है।
कुछ दिनों बाद अन्य मामलों की तरह यह मामला भी शांत हो जाएगा परंतु भाषाओं के साथ जिस उद्दंडता का व्यवहार हम-आप कर रहे हैं, शायद एक दिन भाषाएं भी हमें इस कृत्य के लिए कभी माफ न करे!
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 9:19 PM 3 comments
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Friday, November 6, 2009
हिंदुस्तान में सब भ्रष्ट हैं!
सुप्रिम कोर्ट के जज मार्कंडेय काटजू ने भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'हिंदुस्तान में सब लोग भ्रष्ट हैं। ये भ्रष्टाचार कभी ठीक नहीं हो सकता। मेरा वहम था कि मैं भ्रष्ट लोगों को ठीक कर सकता हूं। अब मैं समझ गया कि भ्रष्ट लोगों को ठीक करने का कोई चारा नहीं।' साफ समझा जा सकता है कि जस्टिस काटजू भ्रष्टाचार से बेहद आहत हैं। उन्होंने यह मान लिया है कि यह बीमारी लाइलाज है। हमें हर वक्त इसी दलदल में धंसे रहकर अपने कामों व जिंदगी को चलाए रखना है।
हमारे आस-पास भ्रष्टाचार का साम्राज्य जिस तेजी से फैल रहा है, उस आधार पर अब इसे सिर्फ समस्या नहीं माना जा सकता। यह समस्या से बहुत आगे बढ़ चुका है। भ्रष्टाचार सिर्फ केंद्रों या राज्यों को ही प्रभावित नहीं कर रहा वो देश व समाज के हर आमो-खास को निगल रहा है। आप कहीं भी आंख उठाकर देख लीजिए हर तरफ भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। सिर्फ सरकारी दफ्तरों में ही नहीं निजी क्षेत्रों में भी भ्रष्टाचार अपने पैर पसार चुका है। बेशक, हम यह कहकर अपना पिंड छुड़ा लेते हैं कि सामाजिक व राजनीति व्यवस्था ही इसके लिए जिम्मेदार है। राजनीति व अफसरशाही में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है। लेकिन सवाल यहां यह पैदा होता है कि इस व्यवस्था को बनाने या पैदा करने वाले लोग तो हम-आप ही हैं। समाज और राजनीति के भीतर ऐसी व्यवस्था को लाने व फैलाने में कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं। हम इस व्यवस्था से अलग की चीज नहीं हैं।
भ्रष्टाचार का एक खास कारण 'असमानता' भी है। असमानता कद और कुर्सी की। छोटे और बड़े की। राजनेता और आम आदमी की। ताकतवर और कमजोर की। बेईमान और ईमानदार की। ये असमानताएं कहीं न कहीं व्यक्ति के भीतर दूसरे से श्रेष्ठ हो-बन जाने का लालच भी पैदा करती हैं। सारा का सारा झुकाव बस इस बात पर बना रहता है कि पैसा आना चाहिए। चाहे कहीं से और कैसे भी। ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की होड़ ही हमें भ्रष्टाचार की अंधी गलियों में ला पटकती है। देश और समाज के भीतर जिस तरह से रहने-खाने-पीने की स्थितियां बदल रही हैं, ये भी भ्रष्टाचार को कहीं न कहीं दावत दे रही हैं।
सरकारें भ्रष्टाचार पर सिवाय बयान देने के कुछ नहीं करतीं। मंत्री और नेता जनता से तो ईमानदार बनने का आह्वान करते हैं किंतु खुद वे भ्रष्टाचार के हमाम में नंगे रहना पसंद करते हैं। अब तो हमारे बीच इस धारणा ने जोर पकड़ लिया है कि जो नेता या मंत्री जितना भ्रष्ट या बेईमान होगा वो उतना ही बड़ा समाज व देशसेवक होगा। यानी अब देश और समाज से कहीं ज्यादा बड़ा नेताओं का 'भ्रष्ट चरित्र' हो गया है। राजनीति में चरित्र के क्या मायने रह गए हैं, इसे बताने की जरूरत नहीं।
मधु कोड़ा के मामले के बाद एक दफा हम फिर से भ्रष्टाचार पर सख्ती से बोलने व सोचने लगे हैं। बुद्धिजीवि भ्रष्टाचार के खातमें पर कलम तोड़ रहे हैं। तथाकथित समाजसेवक मूल्यों की ओर पुनः लौटने की बात कर रहे हैं। मीडिया अपनी गा-बजा रहा है। लेकिन देश का गरीब खामोशी से सबकुछ सुन और देख रहा है। क्योंकि उसे मालूम है कि वो जितना दिमाग भ्रष्टाचार के हानि-लाभ पर खर्च करेगा उतने समय में तो दो वक्त की रोटी की जुगाड़ कर लेगा।
मधु कोड़ा के पास से अब तक जितना भी धन-संपत्ति बरामाद हुई है, वो ऐसे पूर्व मुख्यमंत्री की है, जिसने जनता के हितों के लिए उससे वोट के रूप में उसका सहारा मांगा था। जनता ने जब उन्हें अपना सहारा दिया। उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। उसकी कीमत जनता को भ्रष्टाचार के रूप में मिली। मधु कोड़ा का कुछ नहीं गया लेकिन जनता का बहुत कुछ चला गया। उसके अधिकार उसके सम्मान का मजाक उड़ाया है मधु कोड़ा ने।
यह हमारी भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था का कोढ़ है, जिससे मधु कोड़ा जैसे भ्रष्ट नेता ग्रासित हैं। जिस देश का नेता खुद ही बेईमान बनकर जनता को लूटने-खसोटने में लगा हो ऐसी राजनीति या लोकतंत्र में भला किसे और क्यों आस्था हो सकती है? कानून चाहे भ्रष्टाचार पर सख्त हो या भ्रष्टाचारी पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सबकी चमड़ियां मोटी हो चुकी हैं। फिर हम यह भी कैसे मान लें कि कानून या न्याय-व्यवस्था में भ्रष्टाचार नहीं है? कचहरियों में फाइलों को एक हाथ से दूसरे हाथ में देने की कीमत क्या होती है, इससे हम बखूबी परिचित हैं। मगर इसके खिलाफ सुनवाई तो कहीं नहीं होती। हां, अगर कहीं कोई अपवाद सरीखा निकल जाए तो बात दूसरी है।
लगता है भ्रष्टाचार देश की जरूरत बन चुका है। हम इसके आदी हो चुके हैं। शिकायत हम इसलिए नहीं करते क्योंकि हमें अपने काम को जल्दी से जल्दी करवाने की तमन्ना रहती है। काम बनते ही न भ्रष्टाचार पर कोई अफसोस जताता है न ही भ्रष्टाचारी को कोई कोसता। यहां सबकुछ भगवान भरोसे चल और निभ रहा है।
अब इतनी व्याप्क 'भ्रष्टाचारी संस्कृति' पर जस्टिस काटजू को अगर यह कहना पड़े कि 'हिंदुस्तान में सब भ्रष्ट हैं' तो हमें कोई अफसोस नहीं होना चाहिए। वह काफी हद तक ठीक भी हैं।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 1:02 AM 1 comments
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Monday, November 2, 2009
अगले जन्म मोहे कछुआ ही कीजौ
कछुए से मैं खासा प्रभावित हूं। इस धरती पर कछुआ ही मुझे सबसे समझदार और बेखौफ जीव लगता है। लड़ाई-झगड़े से दूर प्रायः शांत रहने वाला। कछुआ किसी दंद-फंद में इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि उसे मालूम है कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आप उसके खिलाफ कुछ भी कहते-सुनते रहें पर उसे कोई मतलब नहीं। कछुए के मस्त और बेफिक्र रहने का मुख्य कारण है उसकी मोटी चमड़ी और गर्दन। ऐसा सुना है कि मोटी चमड़ीवालों की दुनिया और दिमाग काफी मजबूत होता है। मोटी चमड़ीवाले खतरों के प्रति बेफिक्र रहते हैं। यह कछुए की गर्दन का कमाल है कि वो खतरा भांपते ही उसे झट से
अंदर कर लेता है। खतरे के प्रति कछुए का यह व्यवहार मुझे प्रभावित करता है।
अक्सर मुझे कछुए की गर्दन और साहित्यकार की गर्दन में कहीं कोई अंतर नजर नहीं आता। दोनों की गर्दनों में काफी समानताएं होती हैं। साहित्यकार भी बाहरी खतरा भांपते ही झटसे अपनी गर्दन भीतर कर लेता है। यह सच किसी से छिपा नहीं है कि साहित्यकार खतरों के जोखिम अपनी सहूलियतों के हिसाब से ही उठाते हैं। जहां खतरा होगा वहां साहित्यकार कम ही नजर आएगा। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने से कहीं ज्यादा सहज है, गर्दन की हिफाजत करना। अगर गर्दन सुरक्षित तो सबकुछ सुरक्षित है।
मुझे लगता है किसी न किसी जन्म में साहित्यकार कछुए से अवश्य ही प्रभावित रहा होगा। हालांकि साहित्यकार खुद तो कछुआ न हो सका, पर उसने अपनी सुरक्षा के तमाम दांव-पेंच उसी से सीखे हैं।
अब साहित्यकार ऐसे लेखन का जोखिम कम ही उठाता है, जहां खतरा हो। इधर जबसे हिंदी साहित्य में सम्मान-पुरस्कार की मांग बढ़ी है, साहित्यकार ने बचे-खुचे अभिव्यक्ति के खतरों को भी किनारे कर दिया है। सम्मान और पुरस्कार वहीं से प्राप्त किया जा सकता है, जहां आप खतरे को नजरअंदाज करके चलें।
मेरे ख्याल से लेखक या साहित्यकार को कछुए जैसा ही होना चाहिए। लेखन हमेशा गर्दन को ऊंचा करके नहीं अंदर करके करना चाहिए। इससे एक तो खतरा नहीं रहेगा और गर्दन की हिफाजत भी होती रहेगी। उम्र लंबी होगी। जब तक मन चाहे लिखो। फिर न किसी उम्र बढ़ाने वाली दवा की जरूरत पड़ेगी न दारू की। कछुए की जिंदगी चैन की जिंदगी।
आप माने या न माने मैं कछुए की गर्दन और मोटीचमड़ी पर आत्ममुग्ध हूं। हालांकि इस जन्म में तो यह संभव न हो सका, पर मैं चाहता हूं कि अगला जन्म मुझे कछुए के रूप में ही मिले। मैं कछुआ बनकर आत्मसुरक्षा का सुख भोगना चाहता हूं। साथ ही, उसकी तरह लंबी उम्र पाने की तमन्ना भी रखता हूं। कछुआ बनकर मस्ती और बेफिक्री की जिंदगी का मजा ही कुछ और होगा! आराम से जहां-तहां पड़े रहेंगे। ज्यादा किसी ने चू-चपड़ की या कहीं खतरा-सा दिखा तो तुरंत गर्दन अंदर कर ली। अब कहने वाला कहता रहे और बोलने वाला बोलता। फिर न जन की चिंता होगी न जमीन की। देश खतरे से जुझता रहेगा और हम मोटी चमड़ी के भीतर गर्दन अंदर किए चैन की बंसी बजा रहे होंगे। जब मन करेगा खा लेंगे नहीं तो कोई बात नहीं। सुना है, कछुए को ज्यादा खाने की दरकार नहीं होती।
फिलहाल, तो इस जन्म के कटने में अभी समय है पर मैंने अगला जन्म कछुए के रूप में स्वीकार करने का मन बना लिया है।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 10:00 PM 1 comments
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Wednesday, October 28, 2009
ईमानदार राजनीति के नेता!
नेताओं के प्रति मेरी सोच बेहद ईमानदार रही है। मैं नेताओं की ईमानदारी की कद्र करता हूं। धरती पर नेताओं के अतिरिक्त मुझे कोई भी ईमानदार नजर नहीं आता। हमारे देश की राजनीति का डंका देश-विदेश में सिर्फ हमारे नेताओं की 'ईमानदार छवि' के कारण ही बज रहा है। हमारे नेता जन-सरोकारों के प्रति बेहद ईमानदार रहते हैं। ईमानदारी से देश को चलाते हैं। ईमानदारी से घोटाले-घपले करते हैं। ईमानदारी से जनता का वोट मांगते हैं। ईमानदारी से बयान देते हैं। ईमानदारी से अपने राजनीतिक फर्ज को निभाते हैं।
देश की राजनीति की सफलता में ईमानदार नेताओं का खासा योगदान है। जहां और जिस प्रदेश में ईमानदार नेता नहीं होते वो जगह ही जहन्नूम जैसी लगती है। मैं इस आरोप को सही नहीं मानता कि नेताओं ने अपनी बेईमानी पर ईमानदारी का पानी चढ़ा रखा है। भला ईमानदार नेताओं को ऐसा करके क्या मिलेगा? रात-दिन पूर्ण ईमानदारी से जनता की सेवा टहल में लगे रहने वाले हमारे नेता सचमूच महान हैं।
नेताओं की महानता इस बात से ही पता चल जाती है कि भीषण आर्थिक मंदी के बावजूद नेता लोग जनता को यह विश्वास दिलाने में प्रयासरत हैं कि मंदी में धीरज धरो। महंगाई को सहन करना सिखो। अगर एक वक्त की रोटी की जुगाड़ नहीं भी हो पाती है तो कोई बात नहीं। निश्चिंत होकर भूखे पेट सो जाओ। भूखे पेट सोने का अपना ही मजा है। वैसे भी हमारे देश के गरीब को भूखे पेट सोने की अच्छी प्रेक्टिस है। यह केवल हमारे देश में ही संभव है, जहां आम आदमी अपना पेट काटकर अपने बच्चों का नहीं, अपने प्रिय और ईमानदार नेताओं का पेट भरता है। वो ऐसा मानता है कि अगर नेता का पेट भर गया तो समझो उसका भी भर गया। आखिर जनता अपने नेताओं की कथित ईमानदारी की कुछ तो कीमत चुकाएगी ही न!
ईमानदारी हमारे देश के नेताओं का स्वभाव है। वे सही मायनों में ईमानदारी के लिए ही बने हैं। जनता पांच साल में केवल ईमानदार नेता को ही चुनकर भेजती है। अब इतने ईमानदारों के बीच दो-चार बेईमान आ जाएं, तो इसमें भला नेताओं का क्या दोष? नेता तो जनता से भी यह आह्वान करते हैं कि ईमानदार बनो। बेईमानी का सहारा जरूरत पड़ने पर ही लो। लेकिन मुझे तो अपने नेताओं की बेईमानी भी अक्सर ईमानदारी का प्रतीक नजर आती है।
बावजूद इसके लोग कहते हैं कि राजनीति में ईमानदार लोग नहीं आ रहे। राजनीति को ईमानदार नेताओं की सख्त जरूरत है। अरे, राजनीति में इतने सारे ईमानदार तो पहले से ही मौजूद हैं फिर भला और ईमानदारों की क्या दरकार? हमारे देश की राजनीति का हर नेता ईमानदार और सभ्य है। वो तो कुछ लोगों की आदत है, जो बेचारे नेताओं को शक और बेईमानी की निगाह से देखते हैं।
देश और समाज को तो धन्यवाद देना चाहिए हमारे नेताओं का, जो बेचारे इतने दूषित माहौल में भी अपनी ईमानदारी को बचाए हुए हैं! राजनीति में ईमानदारी को सुरक्षित रख पाना कोई बच्चों का खेल नहीं समझे।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 11:25 PM 2 comments
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Wednesday, October 21, 2009
आतंकवाद की भट्टी में झुलसते पाकिस्तान का खुदा ही मालिक
पाकिस्तान अपने ही बुने जाल में फंसता जा रहा है। पाकिस्तान में घोर अशांति का माहौल है। बिना लोकतंत्र का पाकिस्तान असहाय नजर आ रहा है। अब तक अमेरिका की मदद से जिस आतंकवाद को पाकिस्तान पालता-पोसता रहा आज वही उसके गले ही हड्डी बन गया है। पाकिस्तान में सरकार की नहीं तालिबानी आतंकवादियों की चलती है। आतंकवाद पाकिस्तान को अंदर से खोखला कर रहा है। भारत के खिलाफ हर वक्त आग उगलने वाला पाकिस्तान आज अपनी ही आग में झुलसता दिख रहा है। मजा देखिए खुद को पाकिस्तान का हमदम बताने वाला अमेरिका दूर बैठकर इस सब का मजा ले रहा है।
अभी हाल पाकिस्तान में सेना मुख्यालय पर हुआ आतंकी हमला यह बताता है कि आतंकवाद को रोक पाने में पाकिस्तानी सरकार फेल साबित हुई है। हालांकि पाकिस्तान के हुकमरान यह कह रहे हैं कि दहशत फैलाने वालों को बक्शा नहीं जाएगा। उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाएगी। पर दहशतगर्द तो उसकी आंखों के सामने ही हैं फिर वे क्यों नहीं उन्हें पकड़कर सख्त से सख्त सजा देते। पाकिस्तान यह अच्छी तरह जानता है कि अगर उसने दहशतगर्दों को रोकने-टोकने की जरा भी कोशिश की तो उसका अंजाम और भी बुरा हो सकता है। स्वात घाटी में तालिबानों का कहर या फिर लाल मस्जिद पर हमला सभी जगह पाकिस्तानी सरकार और सेना लगभग निष्काम साबित हुई है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर आतंकी हमला हुआ था तब भी पाकिस्तानी सरकार का यही न बक्शने वाला बयान आया था लेकिन उस मामले में आज तक कुछ नहीं हो सका है। न आतंकियों को पकड़ा जा सका न आतंकी वारदातों में कहीं कोई कमी आई। सबकुछ वैसा ही चल रहा है जैसा आतंकी चाहते हैं।
यह सब जानते हैं कि पाकिस्तान की बुनियाद नफरत और अराजकता के दम पर रखी गई थी। विभाजन के बाद पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क बनकर उभरा जिसका काम या तो भारत के खिलाफ नफरत फैलाना था या फिर अपनी ही अराजकता से लड़ना-झगड़ना। पाकिस्तान ने कभी भी ठहर कर यह सोचने-समझने की कोशिश नहीं की कि उसकी यही नफरत और अराजकता भरा आचरण उसे एक दिन अंदर से खोखला कर देगा। और आज वही हो रहा है। भले ही पाकिस्तान अमेरिका को अपना बड़ा हमदर्द मानता-समझता हो लेकिन उसकी हमदर्दी के क्या मायने क्या हैं हम खूब समझते हैं। अमेरिका निरंतर पाकिस्तान को किसी न किसी बहाने आर्थिक मदद कर रहा है। उस आर्थिक मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान कहां कर रहा है यह किसी से छिपा नहीं। बुश से लेकर ओबामा तक पाकिस्तान को सिर्फ बच्चों की तरह समझाया ही गया है कभी उस पर सख्ती नहीं बरती गई।
आतंकवाद पाकिस्तान का शौक है। अपने शौक को पूरा करने के लिए वो भारत में अशांति फैला रहा है। मुंबई हमलों में उसकी संलिप्तता जग-जाहिर है। पर वो इस हकीकत को स्वीकार करने को तैयार नहीं। एक हम हैं जो हर बार उसे सबूत पर सबूत दिए जा रहे हैं। अमेरिका से भी गुहार लगा रहे हैं कि वो पाकिस्तान को कसे। पता नहीं हमारी यह आदत क्यों हो गई है कि हम पाकिस्तान के मामले में अमेरिका का दामन ही हर दफा थामते हैं।
पाकिस्तान में जम्हूरियत का नहीं तालिबानों का राज है। पाकिस्तानी सरकार के समानान्तर वहां तालिबानों की भी सरकार है। तालिबानी सरकार जब और जहां चाहती है वहां कब्जा जमा लेती है। तालिबानी आतंकवादियों ने पाकिस्तानी सरकार की नाक में नकेल कस रखी है। यही कारण है कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री तालिबानों के खिलाफ ज्यादा कुछ कहते-सुनते नहीं। उन्हें खतरा है। अब यह बात अलग है कि वे इस खतरे को मीडिया के समक्ष स्वीकारें नहीं।
लगता है कि पाकिस्तान केवल आतंक की भाषा को ही समझता है। अब जब आतंकवादी उसके गिरेबान तक पहुंच गए हैं तब उसे यह एहसास होने लगा है कि हां आतंकवाद बड़ा खतरा है। मगर अब आतंकवाद को बड़ा खतरा मान या बता लेने से होगा क्या? पेड़ की जड़ें तो मजबूत हो ही चुकी हैं। आतंकवाद से पल्ला झाड़ने के लिए वो भले ही इन हमलों का दाग भारत पर लगाने की कोशिश करे पर जिसका दामन खुद दागदार हो उससे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है?
पता नहीं पाकिस्तान को इस जैसे अभी और कितने आतंकवादी हमलों का इंतजार है। अगर पाकिस्तान में आतंकवाद यूंही फैलता रहा तो एक दिन हमें पाकिस्तान को इतिहास में खोजने को मजबूर होना पड़ेगा। हालांकि वक्त तो निकल चुका है मगर थोड़ा बहुत अभी भी जो उसके पास है उसी में अगर वो कर सके तो आतंकवाद का सफाया करने का प्रण ले सकता है। अगर अब भी वो आतंकवाद को महज खेल ही समझता है तो ऐसे पाकिस्तान का खुदा ही मालिक।
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 5:45 AM 4 comments
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Thursday, October 15, 2009
समृद्धि का प्रतीक सेंसेक्स
सेंसेक्स हमारा देवता है। हमारा दोस्त है। हमारी सुख-समृद्धि का प्रतीक है। सेंसेक्स की सफलता में हमारा औद्योगिक विकास निहित है। हम केवल सेंसेक्स के सहारे ही विकसित व विकासशील होने का सपना देख सकते हैं। अब तो सरकार ने भी यह मान लिया है कि सेंसेक्स की संवेदनाओं में ही उसकी साख सुरक्षित है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सरकार को कृषि से अधिक सेंसेक्स की सेहत की चिंता सताती रहती है। अगर सेंसेक्स सही सलामत है, तो मान लीजिए कि देश, समाज और राजनीति में सबकुछ सही चल रहा है। सभी प्रसन्नता से जी-रह रहे हैं।
इन दिनों सेंसेक्स सोना उगल रहा है। तेजी के पथ पर सरपट-सरपट दौड़ रहा है। शेयर बाजार में खुशी का माहौल है। मंदी के बादल छंटने लगे हैं। दलाल पथ पर दीवाली का सा आलम है। आम आदमी को रोटी से ज्यादा सेंसेक्स और सोना प्रभावित कर रहा है। आखिर हम विकसित होते देश हैं, तो क्यों न सेंसेक्स और सोने के सहारे विकास के चांद पर कदम रखकर झूमें! यह तो 21वीं सदी के मनुष्य का हक है।
आप माने या न मानें। विकसित होते इंडिया में गांव, खेत, किसान और कृषि के भारत से यह बाहर आने का समय है। निश्चित ही विकसित होता इंडिया पिछड़े भारत से कुछ तो अलग होना ही चाहिए! इसे आप विडंबना न मानें हकीकत कहें कि आत्महत्या करते किसान के प्रति संवेदी होने से कहीं ज्यादा चिंतित हम सेंसेक्स की संवेदना के प्रति रहते हैं। इसका कारण है। जो आर्थिक सुख-समृद्धि हमें सेंसेक्स और सोना दे सकता है; आत्महत्या करता किसान या बंजर होते खेत नहीं।
अब सरकार औद्योगिक विकास की चमक पर ही खुश हो लेती है। उसे गरीब या मरते किसान पर सियापे से क्या मतलब! हां, अगर आप भारत की खास्ता हालत पर दुबले होना चाहते हैं तो शौक से होएं, सरकार या मंत्री आपसे पूछेंगे तक नहीं कि क्यों दुबले हुए जा रहे हो भाई! सरकार सेंसेक्स और सोना-चांदी के सहारे विकसित इंडिया बनाने में मसरूफ है। अगर औद्योगिक विकास दर जरा-भी गड़बड़ा जाती है, तो सरकार परेशानी-सी हो जाती है। इसीलिए वो किसान से ज्यादा सेंसेक्स की सेहत की फिक्र करती है।
इस बात पर आप ज्यादा अफसोस न जताइएगा अगर सरकार कभी यह घोषणा करती है कि भारत कृषि नहीं सेंसेक्स प्रधान देश है। मुझे लगता है कि आगे आने वाला वक्त सेंसेक्स का ही होगा। हम सेंसेक्स की मस्ती में झूमेंगे। सोना चबाएंगे। चांदी के बर्तन में खाएंगे। तब किसान, खेत और कृषि इतिहास के मानचित्र पर शायद ही दिखाई दें!
Posted by अंशुमाली रस्तोगी at 11:16 PM 0 comments
Labels: व्यंग्य
